अथ श्री भारत कथा

भारत कहानी प्रधान देश है,जो भारतीय भाषाओं को निरंतर समृद्ध करतीं हैं।

भारत में सर्वाधिक भाषाएँ (भिन्न बोलियों को न जोड़ें तो भी) प्रचलन में हैं, उससे कहीं अधिक विस्तृत भारत का कहानी संग्रह है।गद्य श्रेणी के निबंधो, प्रतिवेदन, भाष्यों, लेखों, व्यंग्यों, अध्ययन लेखों से इतर सही अर्थों में भाषा को समृद्ध कहानी ही करती है। निबंध,सम्पादकीय, भाष्य इत्यादि को रोचक बनाने के लिए भी कहानी की आवश्यकता पड़ती है।

वह कहानी ही है जिसे अपनी दादी नानी से सुनकर बोध,अबोध बालक जो कई दशक बीत जाने के बाद अपने अंतिम श्ःवास तक अपनी भाषा का वही वात्सल्य पूर्ण निश्छल स्वरूप स्मरण कर हृदय को तृप्त करता है।

वह लोक कथा ही है जिन्हें अपनी बोलियों में सुन अल्हड़-मिज़ाज भारत के किशोर का नव-चैतन्य नई हिलोरें लेने लगता है।

अब चूँकि भारत में ज्ञान के संप्रेषण की प्रचलित प्रकृति प्राचीन काल से पठन न होकर श्रुति रही जो सर्वाधिक लोकतांत्रिक व सर्वस्पर्शी है ऐसे में लोक कथाएँ जन्म, कर्म, पात्रता के भेदों से परे जाकर अपने अंचल में आ सकने वाले सभी जनों का एक समान मनोरंजन प्रारंभ से करती रही हैं।

लोक कथाएँ भारतीय जन मानस की चेतना धमनियों का प्रारम्भ से ही संचार रुधिर रहीं हैं, चाहें उनके पात्र पौराणिक हों या आधुनिक वे हरबार भारतीय चित्त पर अपनी छाप छोड़ने में सफल हुए हैं।

चाहें वह ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ का बालपन हो जिसमें बुन्देलों ने “मनु” का बीज डाला और जिसका वटवृक्ष ‘ख़ूब लड़ी मर्दानी’ की “मणिकर्णिका” बन प्रकट हुआ,

या फिर ‘नरेंद्र’ की किशोरावस्था सा जिज्ञासु तपस्वी युवा ब्राह्मण हो जिसकी जिज्ञासाओं का समाधान ‘विवेकानंद’ को भी “व्याधि गीता” के कसाई से करवाना पड़ता है(कर्म योग समझाने के लिए)।

किसी भी राष्ट्र की संस्कृति को जानने समझने के कई उपकरण हो सकते हैं,एक उपकरण है राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में घुमक्कड़ी(दर्शन) उपकरण जिसमें वर्षों तक एक देश में प्रांत-प्रांत ,नगर-नगर का दर्शन कर उसके समाज जीवन की वास्तविक स्थिति का आकलन करना।

उसकी ऋतुओं,जलवायु,उसकी कलाओं,उसकी संस्कृति को अनुभव कर रसास्वादन करना। (हेमसांग,इब्ने-बतूता)

 दूसरा किसी देश विशेष में जन्म लेने वाले महापुरुषों के कर्तुत्व व उनकी प्रेरणा से होने वाली क्रांतियों का अध्ययन कर भी कुछ विशेषज्ञ किसी राष्ट्र की संस्कृति पर निष्कर्ष निकालने की स्थिति में पहुँचतें हैं

 तीसरा उपकरण है समाज जीवन में प्रतिदिन आने वाली समस्याओं का व्यक्ति एवं तदुपरांत देश-समाज कैसे सामना करता है इसको देखकर भी उस राष्ट्र की संस्कृति का आभास होता है,

एक चौथा उपकरण भी है –

महर्षि अरविंद कहतें हैं – किसी राष्ट्र का चरित्र उसके युवाओं की जिह्वा पर आने वाले गीतों से पता चलता है।

भारतीय चेतना पर पड़ी थोड़ी सी औपनिवेशवाद की धूल छाँटने पर स्पष्ट दिखता है की आज भी भारत के युवा अपनी प्रादेशिक भाषाओं के गीतों ,लोककथाओं में जो आनंद पातें हैं वह कहीं और नहीं, जिसके गर्भ में भारतीय संस्कृति ही है।

भारतीयता की विशेषताएँ इसकी लोककथाओं में परिलक्षित होतीं हैं।

अद्वैत/एकात्म – ईश्वर से एकात्म पंजाब का जन जहाँ गुरुनानक देव की कहानियों से लेता है(कहूँ हूँ क़ाबा, कहूँ न क़ाबा) वहीं चित्रकूट के घाट बाबा सूरदास की किवंदतियों में, दक्षिण भारत यमुनामुनि की चेतना और आदि शंकर के तेजोमय तप में, गुजरात नरसी भगत(नरसी मेहता) के गीतों में, बंगाल सहित पूरा पूर्वी भारत चैतन् महाप्रभु के लोकगीतों व दक्षिणेश्वर की कथाओं में, सुदूर सिंध झूलेलाल की कहानियों में ,असम ईश्वर में सगुणता संत शंकरदेव के कहानियों में, मध्यभारत स्वामिरामतीर्थ, संत रामदास,संत एकनाथ के सेवाप्रसंगो में देखता है।(कांवड के जल को शिव जलाभिषेक के बजाय निरिह प्यासे गधे को पिलाने के लिए जो करुणा उपजी उसके मूल में गधे और स्वयं में एक ही ईश्वर के दर्शन हैं)।

 समन्वय- इस संस्कृति के मूल में ही समन्वय है,

एकम सत्, विप्र बहुधा वदंति॥

जैसा भक्त, वैसा भगवान मानने वाले बहुतेरे मिल जातें है। समन्वय को समझने के लिए लोककथाओं की और जाएँ तो मिथिला की “स्वर्ग-नर्क” का स्मरण स्वतः हो आता है। युधिष्ठिर के सदेह स्वर्गगमन की कथा भी रोचक है जो वस्तुतः भारत के सब भागो में भिन्न भिन्न तरीक़े से कही जाती है।जातक कथाएँ (महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों का कथा संकलन) समन्वय का अद्भुत उपदेश करतीं हैं।गार्गी-याज्ञवल्क्य, आचार्य दण्डी-अष्टावक्र सम्वाद समन्वय का उपकरण बताता है।

संयम- सब कुछ(संसाधन) मेरे लिए नहीं है, अपने जीवन की आवश्यकताएँ न्यूनतम रखकर जीवन के सर्वोच्च आदर्श तक पहुँचने की कथाएँ यहाँ प्रायः सुनने को मिल जाती हैं ,इंद्र-पुरोचन कथा इंद्र के इन्द्रिय जय होने का साक्ष्य देती है,

तृष्णा व वासनाओं से मुक्ति की प्रतिध्वनि कभी उज्जैन के राजा भतृहरि के क्रोध,शोक व ग्लानि में भरकर कामदेव को कहे गए तिरस्कार व धिक्कार के शब्दों में सुनी जाती है, तो कहीं जड़-भरत की अतृप्त वासनाओं व जन्मों के जाल की कथा में प्रतिबिम्बित होती है,

तो कभी कृष्णा के तीरों पर आदिअम्मा-अरुणगिरी की मार्मिक लोककथा में आसक्ति के बंधनो को तोड़ती है।

वीरोचित-त्याग- इस भरत भूमि पर ही युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ में आयी हुई गिलहरी शुद्ध त्याग का मर्म बताती है।कहीं व्रजायुद्ध की लोक कथा राजा शिबि जैसे अजातशत्रु के करुण क्रमिक देहदान की महिमा कहती है, एक लोककथा में शुद्ध निमित्त के लिए किया गया दधीचि का उत्सर्ग उन्हें कालजय कर जाता जाता है।एक ओर मृत्युंजय कर्ण वचन की रक्षा के लिए कवच कुण्डल त्याग करते हैं वहीं दूसरी और जनकल्याण के लिए रणभूमि का त्याग करके ‘रणछोड़’ योगिराज श्रीकृष्ण शांति का आदर्श स्थापित करते हैं। समूचे विश्व में भीष्म के त्याग की कथा अद्भुत निराली है आज जब विश्व अधिकारो व कर्तव्यों के अंतर्द्वंदो में फँसा है तब अधिकारो के त्याग की यह कथा अद्भुत है।

कृतज्ञता- मेरा जीवन केवल मेरा नहीं है, मेरे अस्तित्व में इस पूरे संसार, जीवजगत का सहयोग है इस कारण मेरा जीवन भी इन सभी के लिए है ऐसा भाव रखकर सत्य को पाने की कथाएँ भारत में सुनने मिलती हैं।राजस्थान की लोककथाओं में भामाशाह जब अपनी जीवनसंचित पूँजी महाराणा के चरणो में रखतें हैं तो उसका हेतु भी यही है-मातृभूमि की पूँजी मातृभूमि के लिए होम।

पन्ना धाय का सिसोदिया राजपूताने के प्रति कृतज्ञता कि भाव चकित करता है।पंजाबी लोककथाओं में श्री गुरु तेग़ बहादुर की समाज के प्रति कृतज्ञता मार्मिक बलिदान युवाओं को अद्भुत प्रेरणा देता है।

लोक कथाओं की सिरमौर रामायण के नायक भगवान श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन कृतज्ञता का अनुकरणीय उदाहरण है।

ऐसे ही हितोपदेश,पंचतंत्र, सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी आदि कथा संग्रहों ने भारतीयों का मूल्य आधारित मनोरंजन किया है।

कल्पना को भी उड़ान भरने के लिए आदर्श के इंधन की आवश्यकता होती है।

मुंशी प्रेमचंद को “राजा हरदौल” जैसा शौर्यपूर्ण नायक व “रानी सारँधा” जैसी नायिका लिखने के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ा यहीं बुंदेलखंड की धरती पर उन्हें वे आल्हा,उदल, पृथ्वीराज चौहान एवं झाँसी की रानी के रूप में सुलभ हैं, जहाँ कहा जाता है-

“बुंदेलखंड की सुनो कहानी बुंदेलों की बानी में पानीदार यहां का घोड़ा, आग यहां के पानी में”

या जब श्री रामधारी सिंह दिनकर अपनी कविता “वीर बालक” में लिखतें हैं-

हम हैं शिवा-प्रताप के वंशज,

रोटियाँ भले घास की खाएँगे|

मगर किसी ज़ुल्मी के आगे,

मस्तक नहीं झुकाएँगे॥

शब्दों में उनके आदर्श बालक छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप हैं और नेपथ्य में वीर बालकों हक़ीक़त राय, चार साहिबज़ादो, बालक भरत, बालक पृथ्वी सिंह जैसे असंख्य बालकों की जीवंत शौर्यगाथाएँ जो दिनकर के विचार-केंद्र को ऐसी रचनायें लिखने की सामग्री देतीं हैं।

मीरा के प्रेम के गीत हों या “हीर रांझा” या हाशिम के “सोहनी-महिवाल” जैसे लोकनाट्य सबमें लेखक ने सिया-राम, राधा-कृष्ण को आदर्श मान कर विग्रह, निश्छल प्रेम, पवित्रता को एकरूप कर अपने पात्रों को गढ़ा है।

 सत्य कहूँ तो इस राष्ट्र को कहानी से एवं यहाँ की कहानी को इस राष्ट्र से पृथक नहीं किया जा सकता

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