भगत सिंह : सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं

   

एक लोकप्रिय युवा नेता जिसने आठ वर्ष के छोटे से राजनीतिक-सामाजिक जीवन में अपने बौद्धिक-वैचारिक सक्रियता से, इतिहास में अपना नाम अंकित कर गया। अपने स्नातक के दौरान उनका एक लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ पढा था। उसके बाद उन्हें लेकर हमेशा से एक कौतुहल बना रहा। सोचता था कि क्या इतनी गूढ बातें लिखने वाला, बस एक उन्मादी क्रांतिकारी मात्र है। हमारे देश में आज सिर्फ वो एक क्रांतिकारी के रुप में जाने जाते हैं जिसने अंग्रेज़ो के ख़िलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की थी। एक आलसी पाठक होने के नाते, चाहता था कि उनके सम्पूर्ण जीवन और वैचारिक पहलुओं को बस एक किताब पढकर जान लूँ। लेकिन मैं अपने इस निरर्थक प्रयास में सफल न हो सका, और यह अच्छा भी हुआ। वरना एक आवारा पाठक बन भवरें की तरह मंडराता रहता।

इस वर्ष विश्व पुस्तक मेला में घूमते हुए मुझे  कुछ अच्छे कथेतर साहित्य की तलाश थी। तभी ‘सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय’ के ‘सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन’ से भगत सिंह के अध्येता और शोधकर्ता प्रो.चमन लाल के द्वारा संपादित पुस्तक ‘भगत सिंह : अद्वितीय व्यक्तित्व’ पर मेरी नज़र पङी। यह पुस्तक चार खंडों में विभक्त है। ये चारों खंड एक-दूसरे से स्वतंत्र भी हैं और संबद्ध भी। इन्हें अलग-अलग पुस्तक के रुप में भी पढा जा सकता और एक संबद्ध दस्तावेज़ो के रुप में भी। पहले खंड में भगत सिंह के पत्र, तार, पर्चे और अदालती बयान संकलित है। दूसरे खंड में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे भगत सिंह के लेख शामिल किए गए हैं। तीसरे खंड में क्रांतिकारियों के रेखाचित्र को शामिल किए गए हैं। चौथे खंड में भगत सिंह की जेल नोटबुक है जिसमें 1929-31 के दौरान जेल में पढी गई पुस्तकों से लिए गए नोट्स और उद्धरणों का हिंदी अनुवाद है। इसके साथ ही क्रांतिकारी डॉन ब्रीन की आत्मकथा का भगत सिंह द्वारा किया गया अनुवाद भी इस खंड में शामिल है।

मैंने अभी जिस खंड को पढने के लिए चुना वो इसका दूसरा खंड है जिसमें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे इनके लेख शामिल है। दुर्भाग्यवश भगत सिंह को जिस चीज़ के लिए सबसे अधिक प्रचारित किया जाना चाहिए था उसके लिए नहीं किया गया और वो बस एक उग्र क्रांतिकारी मात्र बनकर रह गए।

उनकी राजनीतिक-सामाजिक जीवन में बौद्धिक-वैचारिक सक्रियता अभूतपूर्व रही। हिंदी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी में लिखे उनके लेख अपूर्व बौद्धिक प्रतिभा और व्यापक अध्ययनवृत्ति को दिखाता है। इस खंड में इनके 21 अलग-अलग लेखों संकलित किया गया है, जो की अलग-अलग भाषाओं के पत्रिकाओं में छपी थी। इन लेखों में विशेष रुप से साहित्य, राजनिति और समाज के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। राजनिति और धर्म, समाज में अछूत समस्या, युवा और समाज, युवा और राजनिति, विभिन्न वाद, राजनैतिक क्रांति जैसे विषयों पर इन्होंने अपने विचार व्यक्त किए हैं। पंजाबी भाषा और लिपी समस्या पर बात करते हुए एक जगह ये कहते हैं कि आर्यसमाज के प्रारंभ के दिनों में सिक्खों तथा आर्यसमाजियों की धार्मिक सभाएं एक ही स्थान पर होती थीं। तब उनमें कोई भेदभाव न था, लेकिन, सत्यार्थ प्रकाश किन्हीं दो-एक वाक्यों के कारण आपस में मनोमालिन्य बहुत बढ गया और एक-दूसरे से घृणा होने लगी। इसी प्रवाह में बहकर सिक्ख लोग हिंदी भाषा को भी घृणा की दृष्टि से देखने लगे।  

आज़ादी और सरकार के खिलाफ युवाओं को जागरुक व आह्वाहन करते हुए उन्होंने कहा कि “ अमरिका के युवक दल के नेता पैट्रिक हेनरी ने अपनी ओजस्वनी वक्तृता में एक बार कहा था- Life is a dearer within the prison-cell, where it is price paid for the freedom’s fight. ” वहीं, विश्व प्रेम पर लिखे एक लेख में वीर सावरकर का ज़िक्र करते हुए वो कहते है कि “विश्वप्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी, कट्टर अराजकतावादी कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नहीं समझते- वही वीर सावरकर।

वहीं ‘अछूत’ जैसी सामाजिक कोढ पर अपनी बात रखते हुए वो कहते हैं कि “जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया बीता समझोगे तो वह जरुर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जायेंगे, जिनमें उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे, जहां उनसे इंसानों जैसा व्यवहार किया जाएगा। फिर यह कहना कि देखो जी ईसाई और मुसलमान हिंदू कौम को नुकसान पहुँचा रहे हैं, व्यर्थ होगा। ” ऐसे अनेक उद्धरण दिए जा सकते हैं जिनमें इनकी बौद्धिकता और वैचारिक्ता को देखा जा सकता है। क्रांतिकारी के वैयक्तिक, राजनितिक, सामाजिक, और बौद्धिक जीवन की अंतरंगता को दिखाते ये दस्तावेज़ स्वाधीनता संग्राम का दहकता इतिहास है जिसे पढना और जानना आज के पाठक की बुनयादी जरुरत है। ताकि वह अपनी जङों से, अपनी परंपरा से जुङ सके और अपने वर्तमान के ज्वलंत सवालों का सामना कर सके। जो लोग भगत सिंह को अपना आदर्श मानते हैं उनके लिए ये चारो खंड सागर के समान है। पाठकों से अनुरोध है कि भगत सिंह को अपने विचारों में सिर्फ क्रांति तक सीमित न रखें, और इन चारों खंडों को ज़रुर पढें।

Digvijay kumar

Graduation in Hindi Literature, Post graduation in Hindi Literature, NET Qualified, Pursuing PHD, Working as a Translator.


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